Jaipal Singh biography Hindi – जयपाल सिंह की जीवनी

Jaipal Singh biography Hindi – जयपाल सिंह ओलंपिक में पहले भारतीय कप्तान जीवनी – इनका नाम शायद ही आप लोगों में से किसी ने सुना होगा. यह उन भारतीय खिलाड़ियों में से एक है, जिन्हें ओलंपिक मे पहले भारतीय कप्तान होने का गौरव प्राप्त है. इन्होंने हॉकी में भारतीय खेल संघ का प्रतिनिधित्व किया था.

वर्ष 1932 में हुए ओलंपिक में लॉस एंजेलिस से कैप्टन के रूप में ही ने बुलाया गया था. इन्होंने ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया था. आज के हमारे इस लेख में हम इनके जीवन के बारे में जानेंगे.

Jaipal Singh biography Hindi – जयपाल सिंह ओलंपिक में पहले भारतीय कप्तान जीवनी

जयपाल सिंह को मांरंग गोमके जयपाल सिंह के नाम से भी जाना जाता है. इनका जन्म खूंटी जिला के टकरा गांव में 3 जनवरी वर्ष 1930 में हुआ था.

इन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा टकरा गांव के दानी संत पॉल उच्च विद्यालय से की थी. अपने स्कूली जीवन से ही काफी होनहार विद्यार्थी रहे थे. अपनी कक्षा में सदैव प्रथम आते थे.

जयपाल सिंह केवल पढ़ाई लिखाई में ही नहीं बल्कि खेलकूद से लेकर केक कला संस्कृति के किसी भी पक्ष में उनकी प्रतिभा का कोई भी व्यक्ति कायल हुए बिना नहीं रह सकता था.

जयपाल सिंह आगे की पढ़ाई करने के लिए रांची चले आए. आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें ईसाई धर्म ग्रहण करना पड़ा था.

हिना के बचपन का नाम वेनन्द पहान था. लेकिन, ईसाई धर्म ग्रहण करने के बाद इनका नाम ईश्वरदास रख दिया गया. लेकिन एक खूंटी के रोहित ने इन्हें अपना नाम दिया जयपाल सिंह. खूंटी के पुरोहित का नाम था जयपाल मिश्र. निकटवर्ती गांव मरडं पीढ़ी के सुकरा पहान इनके सांस्कृतिक गुरु रहे थे.

रांची से अपनी उच्च विद्यालय की शिक्षा पूरी करने के बाद मात्र 16 वर्ष की अवस्था में वर्ष 1919 में तत्कालीन संत पॉल स्कूल के प्राचार्य इन्हें रोहित बनाने के उद्देश्य से इंग्लैंड ले गए. वर्ष 1922 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से M.a. की पढ़ाई पूरी की. इस दौरान ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और कैंब्रिज विश्वविद्यालय में उनके सम्मान कोई भी खिलाड़ी नहीं हुआ करता था.

वर्ष 1923 से लेकर के वर्ष 1928 तक यूरोप के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में जाने जाने लगे थे. इसके साथ ही उन्होंने छात्र आंदोलन नेता के रूप में भी अपनी कुशलता दिखाई थी.

ऑक्सफोर्ड शाखा के पूरे अंतर्राष्ट्रीय मंत्री बन गए थे. अपने मुंडारी, नागपुरी, हिंदी, फ्रेंच, इटालियन, स्पेनिश, इंग्लिश आदि भाषाओं पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया था. वर्ष 1928 में इन्हें रॉयल उच्च सेल ग्रुप मे मार्केट असिस्टेंट के रूप में नौकरी भी मिल गई थी.

वर्ग 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र चक्रवर्ती थे. जिन की पुत्री तारा मजूमदार से इनका संपर्क उस समय बहुत प्रगड़ हो गया था जब यह नौकरी के सिलसिले में दार्जिलिंग और कोलकाता प्रवास में थे. प्रगाढ़ मित्रता विवाह के रूप में परिणित हो गया. वर्ष 1931 में इन्होंने उनसे विवाह कर लिया था. युवक मुंडा और युवती बंगालन किंतु शिक्षा दोनों ने इंग्लैंड से ही प्राप्त की थी. इनकी तीन संताने भी हुई – अमर, सीता और जया.

वर्ष 1932 में हुए ओलंपिक में इन्हें लॉस एंजेलिस में कैप्टन के रूप में ही नहीं बुलाया गया था. लेकिन कंपनी ने छुट्टी नहीं दी तब धीरे-धीरे यह सब छूट गया. वर्ष 1934 से वर्ष 1937 तक डच कंपनी को छोड़कर कॉलेज ऑफ कॉमर्स, गोल्ड कोस्ट पश्चिमी अफ्रीका के प्रधानाध्यापक बने गए थे. यहीं पर उन्होंने अपना ग्रह व्यवस्था भी बना लिया था.

इस तरह जयपाल सिंह नए-नए कामों में जुड़ते गए और उनके पुराने काम पीछे सूट ते चले गए थे. यही सिलसिला वर्ष 1938 तक चलता रहा क्योंकि वर्ष 1937 में यह रायपुर के प्रिंस कॉलेज में सीनियर असिस्टेंट मास्टर फिर बाद में वाइस प्रिंसिपल बन गए.

इसके बाद यह बीकानेर में रेवेन्यू कमिश्नर बने और वर्मा सेल के मैनेजर भी बनाए गए थे. यही दौर था जब झारखंड आंदोलन के नेताओं को वर्ष 1937 में बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल बनाने से निराशा तब हुई जब इस मंत्रिमंडल ने अलग राज्य की मांग को ठुकरा दिया था. इसके पीछे यह तर्क दिया गया था कि राज्य अलग होने से खर्च बढ़ेगा जिसके भार वाहन की क्षमता अभी राजकीय कोष को नहीं है.

अब आंदोलनकारियों को आदिवासी महासभा के लिए एक नेता की तलाश थी. ऐसे में उन्हें एक ही नाम सुझा जयपाल सिंह. वर्ष 1939 में नए नेता के रूप में आदिवासी महासभा की प्रगति हुई. 20 जनवरी 1939 में रांची में जयपाल सिंह का भाषण सुनने के लिए और प्रीतम भीड़ जुट गई. अपने इस भाषण में उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी, नागपुरी और मुंडारी भाषा में भाषण देकर के सबका मन मोह लिया था.

छोटा नागपुर में कांग्रेस की साख घटित हुई देखकर आदिवासी असंतोष का पता लगाने का काम राजेंद्र प्रसाद को सौंपा गया था. राजेंद्र प्रसाद ने आदिवासियों की शिकायत दूर करने के लिए ठोस उपयोगी मांग की थी. जयपाल सिंह ने कहा – ” हमें एक आदिवासी मंत्री, एक संसदीय सचिव, जनसंख्या के अनुपात में आदिवासियों का प्रशासन, संसद और अन्य सेवाओं में स्थान, रांची में डिग्री कॉलेज की स्थापना, विपिन बोर्ड और समितियों में आदिवासी प्रतिनिधियों की नियुक्ति चाहिए”.

इसके बाद भी झारखंड को लेकर के आंदोलन चलता रहा. वर्ष 1940 से लेकर के वर्ष 1945 में जयपाल सिंह असिस्टेंट टेक्निकल रिक्रूटिंग ऑफिसर बन गए. वर्ष 1942 से लेकर के वर्ष 1946 तक यह बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन के मेंबर रहते. वर्ष 1943 से लेकर के वर्ष 1946 के बीच में कमांड सर्विस सिलेक्शन बोर्ड के सिविलियन एडवाइजर के रूप में इन्हें नियुक्त किया गया. लेकिन 30 जुलाई वर्ष 1946 को संविधान सभा के सदस्य बन गए.

5 मार्च वर्ष 1949 झारखंड महासभा के अध्यक्ष तथा आदिवासी महासभा के अध्यक्ष बनाए गए. 1 जनवरी वर्ष 1950 के दिन जमशेदपुर में आदिवासी महासभा को झारखंड पार्टी के रूप में बदल दिया गया. अब इस पार्टी में आदिवासी के अतिरिक्त सदान भी आ सकते थे. रातू महाराजा, जरिया गढ़ के राजा, पसारगढ़ के राजा, पालकोट के राजा सभी जयपाल सिंह से जुड़ गए थे.

वर्ष 1952 से लेकर के वर्ष 1970 तक यह लगातार सांसद बने रहे. इसी बीच वर्ष 1944 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी थी तारामणि मजूमदार से इनका तलाक हो गया था. इसके पीछे की वजह यह मानी जाती थी कि सभी सरकारी पदों को छोड़कर जयपाल सिंह झारखंड पार्टी का कार्य कर रहे थे. पुत्र अमर जयपाल सिंह के साथ और बेटियां सीता तथा गया तारामणि मजूमदार के साथ रहने लगी थी.

वर्ष 1954 में पंडित नेहरू की कृपा से इनके रिक्त जीवन में बाहर आ गई जब जहांआरा से इनका विवाह हो गया. जहांआरा इंग्लैंड में पढ़ी लिखी हुई थी थी जो ब्रिटिश फौज के कर्नल रोनाल्डो की पुत्री थी. पहले वे नेहरू के सुझाव पर जयपाल सिंह के सचिव बनी और बाद में उनकी पत्नी. इनसे भी उनकी तीन संताने हुई – वीरेंद्र, जयंत और जानकी.

20 जून वर्ष 1963 को झारखंड पार्टी का विलय कांग्रेस पार्टी के साथ कर दिया गया. जयपाल सिंह सामुदायिक मंत्री बन गए किंतु राजनैतिक चाल के कारण इन से 2 माह 12 दिन पश्चात 2 अक्टूबर को मंत्रालय छीन लिया गया.

नेहरू और जयपाल सिंह में कुछ कटुता आ गई थी. अब यह गहरी होने लगी थी. कांग्रेस सरकार में इनकी पत्नी जहांआरा उदयन मंत्री, पर्यटन मंत्री, शिक्षा मंत्री बनाई जाती रही किंतु जयपाल सिंह को मामूली पद पर नहीं दिया जाता था.

13 मार्च वर्ष 1970 को रांची के बारडेला बहु बाजार के झारखंड पार्टी की सभा में उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया और अपनी पुरानी पार्टी झारखंड पार्टी में लौट आए. 19 मार्च को अपनी पूर्व पत्नी तारा मजूमदार से भेंट हुई थी. दिल्ली में इनकी अस्वाभाविक मौत हो गई. सांसद रहते हुए इनकी मृत्यु हुई थी. शव विमान से रांची लाया गया. यहां से पैतृक गांव टकरा ले जाया गया जहां पूर्णता मुंडा विधि विधान से इनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

जयपाल सिंह मुंडा और ओलंपिक

जयपाल सिंह मुंडा हॉकी इतिहास के सबसे स्वर्णिम समय में टीम के कप्तान रहे थे. उन्होंने वर्ष 1928 में एमस्टरडम नीदरलैंड में होने वाले ओलंपिक के लिए भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी भी की थी.

इस ओलंपिक में हुए खेल में जयपाल सिंह मुंडा ने पहली बार भारतीय हॉकी टीम को हॉकी में स्वर्ण पदक दिलवाया था. हालांकि बाद में ब्रिटिश सरकार के रवैया के कारण उन्होंने अपना खेल छोड़ दिया था और वह राजनीति में उतर गए थे.

भारतीय हॉकी टीम को पहली बार ओलंपिक में गोल्ड मेडल दिलाने वाले जयपाल सिंह मुंडा को हमेशा याद रखा जाएगा. अपनी खेल प्रतिभा के धनी जयपाल सिंह मुंडा ऐसे उन खिलाड़ियों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपनी कप्तानी में ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक पहली बार दिलवाया था.

यह ऐसा दिन था जब भारत में विश्व हॉकी के शीर्ष पर खुद को स्थापित कर दिया था. 26 मई वर्ष 1928 का दिन एम्स्टर्डम में ओलंपिक में स्वर्ण पदक भारतीयों ने जीता था. इस मैच में मेजर ध्यानचंद ने दो गोल दागे थे. इस मैच में भारत ने नीदरलैंड को 3-0 से हरा दिया था.

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